रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपराजेय


     उस  काली रात से निकलकर -

    जो चारों ओर से मुझे घेरे है--

    मैं आभार करता हूँ -

   उन ज्ञात - अज्ञात देवताओं का -

    जिनकी कृपा से मिली है मुझे -

    मेरी यह अजेय आत्मा.


      अनगिनत आपदाओं की 

       कठोर गिरफ्त में भी मैं --

      कभी विचलित नहीं हुआ -

      और न  ही किया  मैंने 

       करुण विलाप.

   

     दुर्योग  के कठोर प्रहारों से -

     रक्तरंजित भले ही हुआ मेरा शीश,

     किन्तु झुका नहीं -

      कभी भी.


      क्रोध और अश्रुओं से भरी इस दुनिया में -

       सर्वत्र व्याप्त है  अंधकार  का भय 

       किन्तु  राह में आते  संकटों  ने -

       मुझे सदैव निर्भीक पाया  -

      और यही होगा भविष्य में भी.

     


      किंचित परवाह नहीं मुझे, कि -

     कितना दुर्गम होगा मेरा रास्ता -

      कितने अभियोग, कितने दंडादेश 

       अंकित हैं मेरे  भाग्य -लेख में,

    

       मुझे  विश्वास है  कि -

       मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ -

        और अपनी अजेय आत्मा का- 

         नियंता भी.


      A sense transcreation of  " INVICTUS "  by  William Ernest Henley 

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