करुणा --
मानव मन की कोमलतम भावना
जो नहीं स्वीकारती कोई बंधन,
और होती, स्वर्ग से निः शब्द उतर -
धरती की गोद में समाने वाली -
वर्षा की शीतल बूंदों जैसी!
आती साथ लेकर दोहरा वरदान
धन्य करता समान रूप से जो
पाने वाले के साथ साथ
देने वाले को भी.
करुणा --
मानव मन की कोमलतम भावना
जो नहीं स्वीकारती कोई बंधन,
और होती, स्वर्ग से निः शब्द उतर -
धरती की गोद में समाने वाली -
वर्षा की शीतल बूंदों जैसी!
आती साथ लेकर दोहरा वरदान
धन्य करता समान रूप से जो
पाने वाले के साथ साथ
देने वाले को भी.
अँधेरे से घिरा हुआ मैं
आभार करता हूँ उन अदृश्य देवताओं का -
जिनकी कृपा से मिली है मुझे -
मेरी यह अजेय आत्मा.
अनगिनत विपत्तियों के -
क्रूर पंजों में जकड़ा जाने पर भी -
मैं न कभी विचलित हुआ -
और न ही रोया दहाड़ मार कर.
दुर्योग के कठोर प्रहारों से -
रक्तरंजित तो हुआ मेरा शीश,
किन्तु झुका नहीं -
कभी भी.
क्रोध और अश्रुओं से भरी इस दुनिया में -
सर्वत्र व्याप्त है भय का अंधकार -
किन्तु निरंतर सामने आती आपदाओं ने -
मुझे सदैव निर्भीक पाया है -
और ऐसा ही होता रहेगा -
आगे भी.
किंचित परवाह नहीं मुझे, कि -
कितना दुर्गम होगा मेरा रास्ता -
कितने दंड आदेशों से भरी होगी -
मेरी भाग्य कुंडली.
मुझे विश्वास है कि -
मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ -
और नियंता भी -
अपनी अजेय आत्मा का!!
A sense transcreation of " INVICTUS " by William Ernest Henley
वे चमकदार हरी पत्तियाँ -
पेड़ों का श्रृंगार बनी जो
झूमती रहतीं हवाओं में,
जीवन- संगीत की लय पर.
किन्तु, देखा है कभी ठहर कर-
उन पीले, सूखे पत्तों को भी,
जो अपना जीवन चक्र पूरा कर,
बिखरे पड़े होते हैं धरती पर,
अंतिम समर्पण में?
काल के सुनियोजित क्रम में
पूर्व- निर्धारित है उनका भी
विश्व -रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा,
निर्विरोध,चुपचाप नीचे उतर जाना
जीवन- नाटक के हर पात्र की तरह.
इसलिए यह छोटा सा निवेदन कि--
जब कभी गुज़रना हो किसी ऐसे रास्ते से-
जहाँ बिखरे पड़े हों में पीले, सूखे पत्ते,
तो तनिक सँभाल कर रखना अपने कदम,
ताकि आ न जायें वे पैरों के नीचे.
इतना आदर तो देना ही होगा उन्हें,
जो जीवन भर निः स्वार्थ सेवा करते रहे ,
सुलभ कराते रहे हमको जीने के सम्बल,
मात्र फल -फूल, शीतल छाया ही नहीं-
साँसों की साँस, अदृश्य प्राण - वायु भी.
छाया चित्र, साभार
विनेश पोसवाल
क्षितिज तक लहरा रहा चिर -सजग सागर
संजोये अपनी अतल गहराइयों में
शंख,मुक्ता,हीरकों के कोष दुर्लभ
दौड़ती आतीं निरंतर बलवती उद्दाम लहरें
लौट जातीं कुछ न कह कर, किन्तु लगता
कर रहीं उपहास मेरी भीरुता का
" पा सकोगे कुछ वहाँ पर बैठ कर तुम
यदि नहीं आगे बढ़े तज कर किनारे?
बिना पैठे ही गहन जलराशि में क्या
हाथ आयेंगे कभी मोती तुम्हारे?"
यह चुनौती है कि अवसर,
मिटेगा अस्तित्व या मोती मिलेंगे,
जान पाना है कठिन,
जब तक न जा उनसे मिलूँ मैं,
तीर पर कैसे रुकूँ मैं ?
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उसमें मिलने से पहले
एक अनाम भय से
काँप उठती है नदी
याद करने लगती है उन पर्वत शिखरों को
जहाँ से निकल पड़ी थी कभी
बाल- सुलभ उत्सुकता से
कुछ नया ढूंढने की चाह में
उस लम्बे ,घुमावदार रास्ते
और उसमे मिलने वाले
अनगिनत जंगलों और बस्तियों को
जिन्हें पार कर यहाँ तक पहुंची है
और अब फैली है उसके सामने
दिगंत तक लहराती यह अगाध जलराशि
जिस में प्रवेश करने का अर्थ होगा
सदा,सदा के लिए अदृश्य हो जाना
तो अब क्या करे नदी? कैसे बचाए अपना अस्तित्व?
पीछे तो लौट नहीं सकती
और अन्य कोई मार्ग दिखाई नहीं देता
दूर -दूर तक
प्राण रहते वापस जाना संभव नहीं
और नहीं है कोई अन्य विकल्प भी
समुद्र में प्रवेश करने का जोखिम
उठाना ही पड़ेगा नदी को
शायद तब ही मुक्त हो पायेगी
इस भय और दुविधा के भ्रम जाल से
और स्वयं अनुभव करेगी
एक नए अस्तित्व में प्रोन्नत होने का सुख
जान जाएगी कि सागर में मिल जाना
अस्तित्व विहीन होना नहीं होता
बल्कि उसके साथ एकाकार होकर
स्वयं सागर बन जाना होता है!!
लेबनानी / अमेरिकी कवि खलील जिब्रान की " Fear " शीर्षक कविता का भावानुवाद
करती हूँ विनम्र याचना
कि मिटा डालो समूल
मेरे ह्रदय की दरिद्रता को
उस पर निरंतर प्रहार करके
शक्ति दो मुझे देव, कि -
सुख दुख दोनों को ही
समान भाव से सहज रहकर
सहन कर सकूँ.
शक्ति दो कि निर्बलों, निर्धनों
से कभी विमुख न होऊँ
और न कभी घुटने टेकूँ
धृष्ट और दम्भी शक्तियों के समक्ष.
यह भी कि मन मस्तिष्क को
उठा सकूँ बहुत ऊपर
नित्य प्रति की क्षुद्र बातों से
ताकि रहूँ उनसे सदैव अप्रभावित
शक्ति दो कि अपने प्रेम को
सेवा में परिणत कर फलीभूत कर पाऊँ
और कर सकूँ स्वयं को समर्पित तुम्हें
सम्पूर्ण प्रेम के साथ.
गुरुदेब रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का हिंदी रूपांतर
(गीतांजलि 38)
हम देख नहीं पाते अक्सर
काले, घने, बादलों के पीछे छुपी
सुनहरी किरणों का सच.
पर,अंधेरा कितना भी घना हो
टिक नहीं सकता लम्बे समय तक
सूरज की अदम्य ऊष्मा और
प्रभामण्डल के समक्ष.
अँधेरे - उजाले का यह खेल
चला आ रहा आदिकाल से, और
चाहे अनचाहे सभी को बनना पड़ता है
इसमें प्रति भागी.
यद्यपि सुख का एक द्वार बंद होने पर
प्रायः खुल जाता है कोई दूसरा द्वार भी
किन्तु दुख में डूबी हमारी ऑंखें
देखती रहतीं हैं देर तलक बंद किवाड़ों को ही.
और देख नहीं पातीं उस नये द्वार को
जो खुल गया है हमारे सामने
सुखद संभावनाओं से भरे भविष्य की
झलकियाँ दर्शाता.
करुणा -- मानव मन की कोमलतम भावना जो नहीं स्वीकारती कोई बंधन, ...