हे मेरे प्रभु!
करती हूँ विनम्र याचना -
कि निर्मूल कर दो -
मेरे ह्रदय की दरिद्रता को -
उस पर निरंतर प्रहार करके।
शक्ति दो मुझे देव, कि -
सुख दुख दोनों को ही -
समान भाव से सहज रहकर -
सहन कर सकूँ।
शक्ति दो कि निर्बलों, निर्धनों -
से कभी विमुख न होऊँ -
और न कभी घुटने टेकूँ -
धृष्ट और दम्भी शक्तियों के समक्ष।
यह भी कि मन मस्तिष्क को -
उठा सकूँ बहुत ऊपर -
नित्य प्रति की क्षुद्र बातों से-
ताकि रहूँ उनसे अप्रभावित.
शक्ति दो कि अपने प्रेम को -
सेवा में फलित कर पाऊँ
और स्वयं को समर्पित कर सकूँ तुम्हें -
सम्पूर्ण प्रेम के साथ.
गुरुदेब रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का हिंदी रूपांतर
(गीतांजलि 38)

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