बुधवार, 11 सितंबर 2024

नदी का भय



    कहते हैं सागर के निकट पहुँचने  पर-

    उसमें मिलने से पहले-

     एक अनाम भय से  -

   काँप उठती है नदी।


      याद  करने लगती है  उन पर्वत शिखरों को-

       जहाँ से निकल पड़ी  थी कभी-

      बाल- सुलभ उत्सुकता से-

      कुछ  नया ढूंढने की  चाह  में।


     उस लम्बे ,घुमावदार रास्ते-

     और  उसमे मिलने  वाले-

     अनगिनत जंगलों और बस्तियों को-

     जिन्हें पार कर यहाँ तक पहुंची है।


    और अब फैली है उसके सामने-

     दिगंत तक लहराती यह  अगाध जलराशि   -

     जिस में प्रवेश करने का अर्थ होगा-

    सदा,सदा के लिए अदृश्य हो जाना।


   तो अब क्या करे नदी? कैसे बचाए अपना अस्तित्व?

   पीछे तो लौट नहीं सकती,

   और अन्य कोई मार्ग  दिखाई नहीं देता -

    दूर -दूर तक।



     प्राण  रहते वापस जाना संभव नहीं-

     और नहीं है कोई अन्य विकल्प  भी -

     समुद्र में प्रवेश करने का जोखिम

      उठाना ही पड़ेगा नदी को।


      शायद तब ही मुक्त हो पायेगी-

     इस भय और दुविधा के भ्रम जाल   से-

    और स्वयं अनुभव करेगी -

     एक नए अस्तित्व में  प्रोन्नत होने का सुख।


    जान जाएगी  कि सागर में मिल जाना -

    अस्तित्व विहीन  होना नहीं होता -

    बल्कि उसके साथ एकाकार होकर

     स्वयं सागर बन जाना होता है!!

       

    


Transcreated from Khalil Gibran's   ( 1883-1931) poem  ' Fear '  


   खलील जिब्रान की यह कविता नदी और सागर के माध्यम से अस्तित्व, परिवर्तन और atm- विलय के गहरे रहस्य को अभिव्यक्त करती है। अपने परिचित मार्ग और अस्तित्व को पीछे छोड़कर सागर से मिलने से पहले नदी के भीतर एक अनाम भय और दुविधा जन्म लेती है। वह पीछे लौट नहीं सकती और आगे बढ़ने के अतिरिक्त उसके पास कोई विकल्प नहीं है। इसी भाऊ के पार उसे एक नए सत्य का बोध होता है -- सागर में मिल जाना अपने अस्तित्व को खो देना नहीं, बल्कि एक व्यापक अस्तित्व में प्रोन्नत होकर स्वयं सागर बन जाना होता है 
यह कविता हमें बताती है कि जीवन में परिवर्तन के क्षणों में उपजा भय  कई बार किसी अंत का संकेत नहीं, अपितु एक नए और बेहतर अस्तित्व की ओर यात्रा का आह्वान होता है 

   

    

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