गुरुवार, 23 मार्च 2023

प्रार्थना


 जब कभी अपनी आर्द्रता खोकर

शुष्क  और कठोर  बन जाये मेरा यह ह्रदय

तब अपनी असीम  करुणा  की बौछार से

 इसे सिंचित  करने आ जाना

मेरे जीवन में प्रभु!


जब खो  जाये जीवन से

 लालित्य और सरसता

किसी मधुर  गीत के बोल बनकर

बरस पड़ना  मेरे मन की धरती पर


जीवन- संघर्ष  का तुमुल कोलाहल

जब सब ओर से घेर, एकांत में बंदी बना ले मुझे

तब हे मेरे मौन के स्वामी, तुम आ जाना मेरे पास

अपनी परम शांति और विश्राम लेकर


  जब मेरा भिक्षुक सा दिन ह्रदय

किसी अँधेरे कोने में दुबका बैठा हो

तुम अपने राजसी दल - बल के साथ

चले आना मेरे पास, सारे द्वार तोड़कर


जब अंतहीन  कामनायें मस्तिष्क को

भ्रम और धूल  से आच्छादित  कर अंधा  बना दें

तब, चिर जागृत  और पावन, हे मेरे प्रभु, मुझे मार्ग दिखाने

प्रकट  हो जाना तुम, अपने दिव्य प्रकाश और घोर गर्जन  के साथ.



                    गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि से एक कविता  का हिंदी रूपान्तर 


     'प्रार्थना ' रविंद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि की उन आध्यात्मिक रचनाओं में जहाँ मनुष्य अपने भीतर की 

      कठोरता, शुष्कता और अंधकार से मुक्ति के लिए परम सत्ता की करुणा और प्रकाश का आह्वान करता         है.। कवि जीवन के संघर्षों और  कोलाहल के बीच ऐसी शांति चाहता है जो भीतर से जन्म ले। जब मन         भ्रम, धूल और अनासंत कामनाओं से ढक जाता है, तब वह ईश्वर से अपने मार्ग को प्रकाशित करने की           प्रार्थना करता है। इस कविता में आत्म- समर्पण, करुणा, शांति और दिव्य प्रकाश की आकांक्षा सहज         किन्तु प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई है। यह प्रार्थना अंततः बाहरी संसार को बदलने से अधिक अपने भीतर     प्रकाश जगाने की पुकार बन जाती है।

  

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