रविवार, 30 अप्रैल 2023
चिर - स्मरणीया माँ
मंगलवार, 28 मार्च 2023
अविस्मरणीय
उस एक शाम
दोपहर बाद की झपकी
अचानक ही टूटी थी
पड़ोस की छत से आती
घंटियों की आवाज़ से
और देखते देखते
गूँज उठा था सारा वातावरण
तालियों, घंटियों और शंख ध्वनियों के
मधुर स्वरों से
सम्मोहित सी मैं भी
घर की छत पर जा पहुंची
और अनायास ही शामिल हो गयी
उस अद्भुत, अपूर्व, संगीतोत्सव में
जहाँ चतुर्दिश गूँजती
विविध स्वरलहरियाँ मानो
बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कहने
फूट पड़ी थी एकाकर होकर
जन -जन की सेवा में जुटे
उन असंख्य कर्मवीरों के प्रति
स्नेह, सम्मान, और कृतज्ञता का यह ज्ञापन
निश्चित ही भावभीना था
और चिर- स्मरणीय भी!
शनिवार, 25 मार्च 2023
पतझड़ के बाद
उस सूनी सड़क से गुजरते हुए
अचानक ही मेरी दृष्टि पड़ी थी उस पर
पत्र -पुष्प विहीन निराभरण रूप उसका
देखकर मन हो गया था विचलित
विगत वैभव की स्मृतियों में खोया
वर्तमान दशा पर आँसू बहाता सा
मौन रहकर भी बहुत कुछ बोलता
अनाकर्षक, फिर भी अपनी ओर खींचता सा
ठिठक गये कदम यह देख अनायास ही
आखिर वह था मेरा परिचित वर्षो का
मनोव्यथा उसकी जान लेने का प्रयास किया
बँटा सकूँ दर्द यदि हो कुछ अपने वश में
पास जाकर पूछा, क्यों उदास हो बंधु आज
कौन सी चिंता सता रही है मन को
तुम तो रहते थे संतुष्ट और प्रसन्न सदा ही
कारण क्या है इस चिंता, उदासी का
भरकर आह लम्बी बोलने लगा धीरे धीरे वह
" दुखी हूँ आज देख कर दशा अपनी
कभी था हरा - भरा संसार मेरा सुंदर
खींच लाता था पास सब अपने परायों को
अनगिनत पंछियों का सुखद रैन बसेरा था
रहते थे सपरिवार घरौंदे बनाकर
धूप से व्याकुल, थके -हारे पथिक भी तो
रुक जाते थे यहाँ शीतल छाँव को पाकर
और आज यहाँ किसी भिक्षु सा उपेक्षित
अकेला ही झेलता दुर्भाग्य के दंश को
एक दृष्टि भी कोई डालता नहीं मुझ पर
फिर बोलो प्रसन्न रह सकता मैं क्योंकर?
स्नेह से छूकर उसे आश्वस्त किया मैंने
" सच मानो दुख के दिन अब बीत चले भाई
देखो वह आती वसंत की सवारी है
पतझड़ और शीत की तो तुम समझो विदाई
सजा देंगी शीघ्र नई कोंपलें तुम्हारा तन
घनी शीतल छाँव देख रुकेंगे पथिक भी
और पंछी तो हैं साथी सदा से तुम्हारे
गूंजेगा उनका मधुर कलरव यहाँ फिर से
प्रतीक्षा की है तुमने बहुत, थोड़ी सी और सही
लौटेंगी सब खुशियाँ मौसम बदलते ही
नहीं विचलित होती कभी प्रकृति अपने क्रम से
पतझड़ के बाद फिर आता है वसंत ही.
शुक्रवार, 24 मार्च 2023
वसंत की पद - चाप
पहन कर बहु रंगी परिधान
प्रकृति करती किसका आह्वान?
भ्रमर लाये किसका सन्देश
तितलियाँ देतीं क्या निर्देश?
सुरभि आप्लावित वातावरण
भेजता किसको आमंत्रण?
पावन की गति होती क्यों मंद
कर रहा बोझिल क्या मकरंद?
पत्र पुष्पों की बन्दनवार
सजी क्यों वन -उपवन के द्वार?
कोकिला लेकर पंचम तान
कर रही किसका गौरव गान?
पाँव से सिर तक खिला पलाश
छलकता किसके प्रति उल्लास?
किसलिए बौराया है आम,
कर रहा झुक, झुक किसे प्रणाम?
छा रहा चहुँ दिशि नव- जीवन,
भला किसका यह शुभ आगमन?
अतिथि वह कौन अनूप, विशिष्ट,
स्वयं वसुधा सुंदरि का इष्ट,
व्यक्त करने आदर, अनुराग
बिछाया पथ पर राग -पराग?
लग रहे आनंदित सब आज
आ गए सचमुच क्या ऋतुराज?
गुरुवार, 23 मार्च 2023
प्रार्थना
जब कभी अपनी आर्द्रता खोकर
शुष्क और कठोर बन जाये मेरा यह ह्रदय
तब अपनी असीम करुणा की बौछार से
इसे सिंचित करने आ जाना
मेरे जीवन में प्रभु!
जब खो जाये जीवन से
लालित्य और सरसता
किसी मधुर गीत के बोल बनकर
बरस पड़ना मेरे मन की धरती पर
जीवन- संघर्ष का तुमुल कोलाहल
जब सब ओर से घेर, एकांत में बंदी बना ले मुझे
तब हे मेरे मौन के स्वामी, तुम आ जाना मेरे पास
अपनी परम शांति और विश्राम लेकर
जब मेरा भिक्षुक सा दिन ह्रदय
किसी अँधेरे कोने में दुबका बैठा हो
तुम अपने राजसी दल - बल के साथ
चले आना मेरे पास, सारे द्वार तोड़कर
जब अंतहीन कामनायें मस्तिष्क को
भ्रम और धूल से आच्छादित कर अंधा बना दें
तब, चिर जागृत और पावन, हे मेरे प्रभु, मुझे मार्ग दिखाने
प्रकट हो जाना तुम, अपने दिव्य प्रकाश और घोर गर्जन के साथ.
गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि से एक कविता का हिंदी रूपान्तर
'प्रार्थना ' रविंद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि की उन आध्यात्मिक रचनाओं में जहाँ मनुष्य अपने भीतर की
कठोरता, शुष्कता और अंधकार से मुक्ति के लिए परम सत्ता की करुणा और प्रकाश का आह्वान करता है.। कवि जीवन के संघर्षों और कोलाहल के बीच ऐसी शांति चाहता है जो भीतर से जन्म ले। जब मन भ्रम, धूल और अनासंत कामनाओं से ढक जाता है, तब वह ईश्वर से अपने मार्ग को प्रकाशित करने की प्रार्थना करता है। इस कविता में आत्म- समर्पण, करुणा, शांति और दिव्य प्रकाश की आकांक्षा सहज किन्तु प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई है। यह प्रार्थना अंततः बाहरी संसार को बदलने से अधिक अपने भीतर प्रकाश जगाने की पुकार बन जाती है।
श्रद्धांजलि --- डॉक्टर अब्दुल कलाम
देकर नई पीढ़ी को
अग्नि पंखों का उपहार
उड़ गया वह देवदूत अचानक ही
अंतरिक्ष की अनंत ऊँचाईयों की ओर
उस अनहोनी वाले दिन
युवा छात्रों के एक दल को
अपने ज्ञान से विस्मित करता खड़ा था
प्रकाश- स्तम्भ सा वह उनके सम्मुख
मन्त्र - मुग्ध से सुन रहे थे सब
वह ओजपूर्ण व्याख्यान, जिसका शब्द -शब्द था
विज्ञान के ख़ज़ाने की जादुई कुंजी
और वक्ता स्वयं उपलब्धियों का दस्तावेज
तभी निरभ्र आकाश से वज्रपात जैसा
देखा सबने वह दुर्भाग्य घटित होता
उनका कटे वृक्ष की तरह भूमि पर गिर जाना
स्तब्ध कर गया देश भर की धड़कनों को
सोचती हूँ क्यों हुआ होगा वह सब
उनका यों अचानक चले जाना
क्या आया था कोई सन्देश उस लोक से
कि उनकी जरूरत थी वहाँ पर तत्काल ही!
और हमने देखा उन्हें असमय ही विदा होते
जो थे सरलता और विलक्षण प्रतिभा के धनी
जिनकी उपलब्धियाँ अमिट गौरव हैं देश की
जिनका जीवन आदर्श युवा पीढ़ी का
प्रखर वैज्ञानिक, अतुल देशप्रेमी भी
जनता के राष्ट्रपति, छात्रों के मित्र
संतों के स्नेह भाजन, सादगी की प्रतिमा
रत्नों में श्रेष्ठ, सच्चे अर्थ में भारत - रत्न
विदा संत विज्ञानी, विदा कर्मयोगी!
जाते हो जब उस अमरों के लोक को
देखेंगे हम भी नील गगन पर दमकता
" अब्दुल कलाम तारा " अब से हर रात में!
बुधवार, 22 मार्च 2023
गिरगिट उवाच
देखा जनवरी की एक सुबह मैंने
अशोक की डाल पर चिपके
उस विचित्र प्राणी को
निश्चिंत सा जो था धूप में लेटा
मुझे निकट आता देख
भागने को उद्यत हुआ
पर मैं भी तुरन्त बोल पड़ी
रुको, आज कुछ पूछना है तुमसे
बड़ा ही अजीब स्वभाव है तुम्हारा
बार -बार रंग बदलते रहते हो
कभी लाल -काला तो कभी हरा -पीला
इतना भी फैशन का गुलाम होना क्या
कि अपनी कोई निश्चित पहचान ही न रहे
फिर कैसे कोई विश्वास करे तुम पर,
प्रकृति ने दिया है हर एक को अलग रंग
तुम क्यों अलग दिखना चाहते सभी से?
सिर ऊँचा उठा कर उत्तर दिया उसने
ठीक कहती हो कि रंग बदलता हूँ अक्सर
पर जानती हो ऐसा करता ही क्यों हूँ मैं
शौक है यह मेरा कि कोई मज़बूरी?
सच तो यह है कि रंग बदलने में
फैशन - वैशन का तो दूर तक विचार नहीं
बस प्राण बचाने की कोशिश भर करता हूँ
तुम्ही कहो जान किसे नहीं होती प्यारी?
छोटा सा जीव , जब भी बाहर निकलता
हमेशा डरा, सशंकित रहता हूँ
कि न जाने कब आहार बन जाऊँ
घात लगाए बैठे किसी दुश्मन का
इसलिए तो यह युक्ति है अपनाई
कि जहाँ जैसा रंग हो, वैसा ही बनकर
छुप रहता ऐसे कि किसी शिकारी को
दिखाई नहीं देता दूर या पास से
बुरा न मानो तो मैं भी कुछ पूछ लूँ
रंग बदलने के लिये मुझ पर हो हँसते
पर क्या तुम स्वयं कभी ऐसा नहीं करते
तुम्हेँ भी रहता है क्या जान का खतरा?
बात उसकी तीर सी चुभ गई मुझ को
उत्तर क्या दूँ कुछ समझ नहीं आया
जानती न थी कि प्रतिप्रश्न कर बैठेगा
कुछ कहने के बजाय चुप रहना ही ठीक लगा
कहती भी कैसे कि रंग बदलना
प्राण बचाने का उपक्रम नहीं हमारे लिये
यह तो है अवसर वादिता की एक चाल
करते उपयोग जिसका जब भी वांछित लगे
कि हम तो रंग बदलते हैं अपने स्वार्थो की खातिर
उचित -अनुचित का विचार किये बिना
नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भी
पूर्ण करना चाहते अपनी अनुचित इच्छायें
सोचते -सोचते ग्लानि छाई मेरे मुख पर
देखकर हाल मेरा वह समझ गया सबकुछ
बोला व्यंग्यपूर्वक जाते - जाते पलट कर
अब तो न हँसोगी फिर कभी मुझ पर?
वह तो जा छुपा पत्तों के बीच फिर से
पर छोड़ गया मुझको यह पाठ पढ़ाकर
कि दूसरों पर उँगली उठाने ने से पहले
झाँक लेना बेहतर है अपने ही गिरेबान में.
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कहते हैं सागर के निकट पहुँचने पर- उसमें मिलने से पहले- एक अनाम भय से - काँप उठती है नदी। याद करने लगती है उन पर्व...
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उस काली रात से निकलकर - जो चारों ओर से मुझे घेरे है-- मैं आभार करता हूँ - उन ज्ञात - अज्ञात देवताओं का - जिनकी कृपा स...
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जब कभी अपनी आर्द्रता खोकर शुष्क और कठोर बन जाये मेरा यह ह्रदय तब अपनी असीम करुणा की बौछार से इसे सिंचित करने आ जाना मेरे जीवन में प्र...





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