सोमवार, 6 नवंबर 2023

इंद्रधनुष


                 इन्द्रधनुष  करते हैं आश्वस्त

                कि रंग कभी भी विलुप्त नहीं होंगे. 

                   प्रकृति के अक्षय भण्डार में

                   रहेंगें  वे सदैव संरक्षित.

               

         

                      और समय -समय  पर 

                प्रकट होते रहेंगे दिव्य आभा के साथ 

                    क्षितिज के  चित्र - फलक पर

                  सप्तवर्णी इन्द्रधनुओं  के रूप में ,

              


               जब भी सूरज ओर वर्षा मिलकर

                खेल -खेल में  बना  देंगे 

              एक सुन्दर  किन्तु अस्थायी सेतु 

               धरती और आकाश के बीच.


                      इंगित करते रहेंगे यह भी 

                 कि प्रकाश की  हर एक किरण

                 संजोये रखती है अपने अंतस में

                सप्ताधिक रंगों का विपुल  संसार,


               और रचती रहती है ऐसे अलौकिक दृश्य

                जो अपनी क्षणिक उपस्थिति से भी 

                विस्मय -मिश्रित आनंद भर देते हैं 

                  वातावरण के कण - कण में.

                    

        

                         


                   

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

आतंकवाद


      आतंकवाद           

      मानव - मन  के 

      निकृष्ट भावों की

      कुरूपतम  अभिव्यक्ति 


    स्वार्थ, विद्वेष और असहिष्णुता

    की भूमि पर पनपती 

     सर्वनाशी विषबेल


     जो लपेट लेती मानव सभ्यता

     के फलते - फूलते उपवनों को

     अपने घातक बाहुपाश में.


     और जन्म देती घोर अविवेकी कृत्यों को

     जिनमें मानव पर मानव का अत्याचार

       तोड़ देता मर्यादा की सारी  सीमाएँ


        आश्चर्य!! कि हजारों वर्षों की

         विकास यात्रा के  बावजूद

          तनिक भी नहीं बदली मनुष्य की

          आदिम प्रवृति!!

     

बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

बुझने न देना कभी ...




  बुझने न देना कभी भी

अपने अंदर की चिंगारी

जिलाये रखना उसे हर हाल में 

 प्राण -पण से यत्न करके.


 क्योंकि इसमें छिपी ज्योति शलाका 

  प्रज्ज्वलित कर सकती पुनः,

  बुझते हुए दीपकों को भी, और  दिखा सकती तुम्हें

  तुम्हारी  अभीप्सित मंज़िल का रास्ता.


जो भय, निराशा, और दुविधा के

 घोर अंधकार के बीच भी 

 अपनी   अदृश्य  उपस्थिति से 

 सँभाले रहती तुम्हें सच्चे मित्र की तरह.

 

  प्रकाश का यह नन्हा सा कण है 

 तुम्हारी अंतर्निहित  क्षमता का उत्स

  जिस पर कर सकते हो भरोसा

  हर प्रतिकूल मौसम में.

  



शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

सूर्यास्त के बाद


दिन का वह अंतिम प्रहर

जब परम -प्रतापी सूर्य देव

अपने विशाल साम्राज्य की बागडोर

 चाँद, तारों  को सौंप,चले जाते हैं

 क्षितिज के उस पार

 अपनी अनवरत यात्रा में


  गोधूलि की  वह पवित्र वेला 

  जब आकाश की गहन शांति

   भंग होने लगती है धीरे - धीरे

 विश्राम के लिये नीड़ों की ओर लौटते

 पंछियों की व्याकुल फड़फड़ाहट

  और तुमुल कोलाहल  से.


  दिवस का अवसान होता देख

  अंधकार पसारने  लगता है अपने पाँव

  तभी उसे चुनौती देते जल उठते हैं असंख्य दीप

   हर  सड़क, गली, और चौराहे पर

   ताकि घर लौटता कोई थका -हारा पथिक

    अँधेरे में भटक, अपना रास्ता न खो बैठे!!



बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

सबसे सुन्दर कविता


 उस दिन

मन में उमड़ते भावों को

शब्दों में ढाल कर, बड़े चाव से

 रची मैंने एक कविता.


फिर बारम्बार उसे पढ़ते हुए

 आनंदानुभूति से भावविभोर हो

 आत्म - विमुग्ध  सी बैठी रही

  कुछ देर तक.


 किन्तु फिर महसूस हुआ 

कि यह तो है बड़ी साधारण सी रचना

इसमें कुछ भी अनुपम,आकर्षक 

 या असाधारण नहीं.


 अतः मस्तिष्क से आग्रह किया

 उसे कुछ बेहतर बनाने के लिये

 उसने अनेक अलंकारिक शब्दों से सजा कर

 पुरानी रचना का काया -कल्प ही कर डाला.


  प्रसन्न थी मैं कि इन नवीन आभरणों  से

  उत्कृष्ट बन जाएगी मेरी साधारण सी कविता

   और पायेगी भरपूर स्नेह एवं प्रशंसा 

   अपने सौंदर्य और सरसता के लिये


   किन्तु,  जब पढ़ने लगी, तो उलझ कर रह गयी 

   दुरूह शब्दावली की भूलभुलैया में

   फिर न रसों का आस्वादन  कर पायी

    न अलंकारों की सराहना.


    हताश हो कर ढूँढने  लगी जब 

     मूल रचना को, उसकी आत्मा को

    तो  पाया  कि निस्पंद सी पड़ी थी वह 

     जैसे किसी अनचाहे बोझ तले.

     


     

        तब  मैंने  समझ लिया कि उसे 

      अपने मूल स्वरुप में  लौटाना होगा 

      समझ गयी थी कि सीधे ह्रदय से निकले शब्द ही 

      होते हैं सबसे सुन्दर कविता.



     

      


गुरुवार, 28 सितंबर 2023

मेरे शब्द


                                मेरे शब्द

                        मुझ से  अलग नहीं

                       वे हैं मेरे अस्तित्व का एक अभिन्न अंग

                       मेरी अन्य ज्ञानेंन्द्रियों की भांति ही


                         उन्हीं के द्वारा तो  मैं व्यक्त कर पाती हूँ

                          अपने विचारों और अनुभूतियों को

                    बँटा सकती हूँ सुख - दुख और चिंतायें

                     अपने लोगों के साथ

      

                     किन्तु, कभी -कभी ऐसा भी होता है

                     कि  बिना कोई कारण  बताये 

                     वे रूठ कर दूर चले जाते हैं

                     मुझे  कुछ भी कहने में असमर्थ  छोड़ कर


                      ऐसे में, बस चुपचाप  प्रतीक्षा करती हूँ

                      उनके वापस आने की

                      जानती हूँ, देर - सबेर अवश्य लौटआयेंगे वे

                      क्षमाशील, आत्मीय, सुजनों की तरह


                      ताकि फिर से जुड़ सकूँ मैं

                      अपने  प्रिय  रचना- संसार  से

                       उन सभी चीजों और लोगों से

                      जिनका साथ सदैव रुचिकर है मुझे....

सोमवार, 11 सितंबर 2023

बरखा रानी



 विनती तनिक हमारी सुन लो

   बरखा रानी

 बहुत हुआ अब  वापस जाओ 

  बरखा रानी!


माना  तुम्हें पुकारा था हमने ही

 सूर्य देव का कोप पड़ रहा था जब भारी

 असहनीय गर्मी से झुलस रहे थे प्राणी'

  त्राहि माम ' करते जाते थे आर्त स्वरों में  


   बड़ी कृपा की , तुमने आकर हमें उबारा

    धन्य हुए वन -उपवन, पशु -पक्षी, घर -आँगन 

      नहीं अमृत से कम थीं वे शीतल बौछारें

     बन संजीवनी उतरी जो मृत-प्राय धरा पर


      बहुत बड़ा उपकार, सदा हम ऋणी तुम्हारे

       युग - युग से  अस्तित्व हमारा तुम पर निर्भर.

     क्षमा -याचना सहित शिकायत  किन्तु हमारी

   अधिक कृपा लगती सबको अब  विनाशकारी 


      हो अनुशासनहीन  नदी नालों ने जमकर

      तोड़ -फोड़ की है सीमा से बाहर जाकर

       डूबे गाँव, गली, मंदिर चौबारे

       उजड़े खेत, बाग, रास्ते, गलियारे


           कहीं  खिसकते हैं पहाड़ तो कहीं फट रहे बादल

           लगता है अभिशाप बन गया जो था जीवन सम्बल

           कौन सँभाले किसको सब ही तो विपदा के मारे

            हों चाहे नर ,नारी,बच्चे, अथवा पशु बेचारे


            हाथ जोड़ यह विनय, कि अब विश्राम करो घर जाकर

            नहीं यहाँ   है और जरूरत हे कल्याणी!

            आना पुनः, पुकारें जब भी कातर होकर

             पर अब शीघ्र विदा हो जाओ हे महारानी!







     



Cover of the upcoming book