शनिवार, 9 दिसंबर 2023

आशा के स्वर


 आशा के स्वर

यूँ तो मधुर होते हैं सदैव ही

किन्तु लगते हैं और भी अधिक कर्णप्रिय 

 जब निराशा के घनीभूत अंधकार में 

 नहीं दिखाई देता कोई भी रास्ता  


  सुनाई देते हैं ये उस एम्बुलेंस के सायरन में 

  जो भाग रही होती है बेतहाशा अस्पताल की ओर 

   दुर्घटना के शिकार घायलों को लेकर 

   ताकि बचाये जा सकें  उनके अमूल्य जीवन


  फायर ब्रिगेड की लगातार बजती घंटियों में

   जो दौड़ रही होती है घटनास्थल की ओर 

  अग्नि की विनाशकारी लपटों  से जूझ कर 

   जान -माल  की हानि  को रोकने.


   

 ग्रीष्म की चिलचिलाती  दोपहरी में 

राहत का सन्देश लेकर, अचानक ही

क्षितिज पर उमड़ आये  बादलों की 

 चिर - प्रतीक्षित  गड़गड़ाहट में.


     

     लम्बी  प्रतीक्षा के बाद 

    प्रसूति गृह से आती नवजात की किलकारी में 

   जो  संकेत देती अपार संभावनाओं  से पूर्ण 

    एक नये जीवन के आरम्भ का.


    आशा के स्वर होते हैं भिन्न एक दूसरे से

     किन्तु एक गुण  में हैं  वे समानधर्मी

     बहता रहता  है उन सबके  अंतर में

      जीवन- संघर्ष का सुमधुर संगीत.




    

   

  



गुरुवार, 9 नवंबर 2023

युद्ध के बाद


                युद्ध  की समाप्ति पर

               शेष रह जायेगा ऐसा क्या

              जिसे  देख - सुनकर सुख पाओगे

              और गर्व कर सकोगे तुम 

              अपनी तथाकथित उपलब्धियों पर?


                रह सकोगे संतुलित देख कर भी

                सर्वत्र बिखरे विनाश के चिह्न

               जिनके मौन में भी मुखरित हो रहा होगा

               निर्दोष पीड़ितों का करुण क्रन्दन ?


                   विचलित नहीं करेंगे क्या तुम्हें

                   खंडहर बने घर, स्कूल, बाज़ार

                   मलबे में बदली ऊँची इमारतें

                  और लावारिस पड़े अनगिनत शव?


                   श्मशान की सी शांति के बीच भी

                   गूँजेंगे नहीं क्या तुम्हारे कानों में

                  असमय ही प्रियजनों  को खो देने वाले

                  शोक -संतप्त लोगों के मर्मभेदी विलाप?


                   कौन विजयी होता है, कौन पराजित

                  यह जानने में तनिक भी रूचि नहीं मेरी

                  चाहती हूँ बस कि लगे पूर्ण विराम शीघ्र 

                   इस अंतहीन प्रतीत होते संघर्ष पर.

              

                    सर्व -विदित हैं  कि युद्ध  नहीं स्थायी समाधान

                  किसी भी विवाद का, और निश्चित ही 

                  घातक  और दूरगामी होते  हैं उसके परिणाम,

                  सभी सम्बन्धित पक्षों के लिये.

               


                    सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद  भी

                   समय तो बचा ही रहेगा यह पूछने  कि --

                  युद्ध की विभीषिका में पल रहे बचपन के लिये,

                  किस तरह के भविष्य की नींव रख रहे हो तुम?


              

              

           ( विश्व के हर युद्ध -रत देश के लिये, किसी का भी पक्ष लिये बिना )

              Photo by

             Jordy Meow on unplash

      

सोमवार, 6 नवंबर 2023

इंद्रधनुष


                 इन्द्रधनुष  करते हैं आश्वस्त

                कि रंग कभी भी विलुप्त नहीं होंगे. 

                   प्रकृति के अक्षय भण्डार में

                   रहेंगें  वे सदैव संरक्षित.

               

         

                      और समय -समय  पर 

                प्रकट होते रहेंगे दिव्य आभा के साथ 

                    क्षितिज के  चित्र - फलक पर

                  सप्तवर्णी इन्द्रधनुओं  के रूप में ,

              


               जब भी सूरज ओर वर्षा मिलकर

                खेल -खेल में  बना  देंगे 

              एक सुन्दर  किन्तु अस्थायी सेतु 

               धरती और आकाश के बीच.


                      इंगित करते रहेंगे यह भी 

                 कि प्रकाश की  हर एक किरण

                 संजोये रखती है अपने अंतस में

                सप्ताधिक रंगों का विपुल  संसार,


               और रचती रहती है ऐसे अलौकिक दृश्य

                जो अपनी क्षणिक उपस्थिति से भी 

                विस्मय -मिश्रित आनंद भर देते हैं 

                  वातावरण के कण - कण में.

                    

        

                         


                   

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

आतंकवाद


      आतंकवाद           

      मानव - मन  के 

      निकृष्ट भावों की

      कुरूपतम  अभिव्यक्ति 


    स्वार्थ, विद्वेष और असहिष्णुता

    की भूमि पर पनपती 

     सर्वनाशी विषबेल


     जो लपेट लेती मानव सभ्यता

     के फलते - फूलते उपवनों को

     अपने घातक बाहुपाश में.


     और जन्म देती घोर अविवेकी कृत्यों को

     जिनमें मानव पर मानव का अत्याचार

       तोड़ देता मर्यादा की सारी  सीमाएँ


        आश्चर्य!! कि हजारों वर्षों की

         विकास यात्रा के  बावजूद

          तनिक भी नहीं बदली मनुष्य की

          आदिम प्रवृति!!

     

बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

बुझने न देना कभी ...




  बुझने न देना कभी भी

अपने अंदर की चिंगारी

जिलाये रखना उसे हर हाल में 

 प्राण -पण से यत्न करके.


 क्योंकि इसमें छिपी ज्योति शलाका 

  प्रज्ज्वलित कर सकती पुनः,

  बुझते हुए दीपकों को भी, और  दिखा सकती तुम्हें

  तुम्हारी  अभीप्सित मंज़िल का रास्ता.


जो भय, निराशा, और दुविधा के

 घोर अंधकार के बीच भी 

 अपनी   अदृश्य  उपस्थिति से 

 सँभाले रहती तुम्हें सच्चे मित्र की तरह.

 

  प्रकाश का यह नन्हा सा कण है 

 तुम्हारी अंतर्निहित  क्षमता का उत्स

  जिस पर कर सकते हो भरोसा

  हर प्रतिकूल मौसम में.

  



शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

सूर्यास्त के बाद


दिन का वह अंतिम प्रहर

जब परम -प्रतापी सूर्य देव

अपने विशाल साम्राज्य की बागडोर

 चाँद, तारों  को सौंप,चले जाते हैं

 क्षितिज के उस पार

 अपनी अनवरत यात्रा में


  गोधूलि की  वह पवित्र वेला 

  जब आकाश की गहन शांति

   भंग होने लगती है धीरे - धीरे

 विश्राम के लिये नीड़ों की ओर लौटते

 पंछियों की व्याकुल फड़फड़ाहट

  और तुमुल कोलाहल  से.


  दिवस का अवसान होता देख

  अंधकार पसारने  लगता है अपने पाँव

  तभी उसे चुनौती देते जल उठते हैं असंख्य दीप

   हर  सड़क, गली, और चौराहे पर

   ताकि घर लौटता कोई थका -हारा पथिक

    अँधेरे में भटक, अपना रास्ता न खो बैठे!!



बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

सबसे सुन्दर कविता


 उस दिन

मन में उमड़ते भावों को

शब्दों में ढाल कर, बड़े चाव से

 रची मैंने एक कविता.


फिर बारम्बार उसे पढ़ते हुए

 आनंदानुभूति से भावविभोर हो

 आत्म - विमुग्ध  सी बैठी रही

  कुछ देर तक.


 किन्तु फिर महसूस हुआ 

कि यह तो है बड़ी साधारण सी रचना

इसमें कुछ भी अनुपम,आकर्षक 

 या असाधारण नहीं.


 अतः मस्तिष्क से आग्रह किया

 उसे कुछ बेहतर बनाने के लिये

 उसने अनेक अलंकारिक शब्दों से सजा कर

 पुरानी रचना का काया -कल्प ही कर डाला.


  प्रसन्न थी मैं कि इन नवीन आभरणों  से

  उत्कृष्ट बन जाएगी मेरी साधारण सी कविता

   और पायेगी भरपूर स्नेह एवं प्रशंसा 

   अपने सौंदर्य और सरसता के लिये


   किन्तु,  जब पढ़ने लगी, तो उलझ कर रह गयी 

   दुरूह शब्दावली की भूलभुलैया में

   फिर न रसों का आस्वादन  कर पायी

    न अलंकारों की सराहना.


    हताश हो कर ढूँढने  लगी जब 

     मूल रचना को, उसकी आत्मा को

    तो  पाया  कि निस्पंद सी पड़ी थी वह 

     जैसे किसी अनचाहे बोझ तले.

     


     

        तब  मैंने  समझ लिया कि उसे 

      अपने मूल स्वरुप में  लौटाना होगा 

      समझ गयी थी कि सीधे ह्रदय से निकले शब्द ही 

      होते हैं सबसे सुन्दर कविता.



     

      


Cover of the upcoming book