शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

माता भूमि : पुत्रो अहम् पृथिव्या :



           पृथ्वी दिवस!
       विश्व - पंचांग  में 
      पृथ्वी  के सम्मान  हेतु
  .   समर्पित  एक दिन
       
        
        
       इस मूक, परम हितैषी
       मातृ -तुल्य सत्ता के प्रति
       श्रद्धा और कृतज्ञता
       ज्ञापित  करने का दिन 


         क्योंकि वह नहीं है मात्र मिटटी, पत्थर

        वरन, एक सजीव,सामर्थ्यवान सत्ता

        असीम धैर्य , सौन्दर्य और औदार्य की 

         सजीव प्रतिमा.


          जन्मदायिनी माँ जैसी स्नेहशीला

          जो पालन करती जन्म से ही, और

         फैला देती अपनाआँचल हमारे लिये 

          खेल कूद कर बड़ा होने को.


         युग - युग से  बाँटती आई  सबको 

        स्वस्थ, सुखद जीवन जीने के सामान

        सिर्फ भोजन, जल, प्राण- वायु  ही नहीं,

         भौतिक समृद्धि के अनंत उपादान भी.


            किन्तु आज उसके अपने ही स्वास्थ्य पर

           पड़ती दिख  रही  ग्रहण की काली छाया 

           विषैले रसायन और प्लास्टिक का दुष्प्रभाव

            करता जा रहा निरंतर क्षरण  उसका

    


             उसके संसाधनों का अनियंत्रित दोहन भी 

             बदल रहा  जलवायु के संतुलन को 

            परिणाम  जिसका परिलक्षित हो रहा 

              दैवी आपदाओं के रूप में.


             तब क्या हम कृतघ्न संतानों की तरह

             बनते रहेंगे उसके पराभव का कारण

           अपने संकीर्ण स्वार्थो  की पूर्ति हेतु

            डाल देंगे उसका अस्तित्व ही संकट में?


             भूलना न होगा कि हमारा अपना जीवन

             निर्भर है धरती के अनन्य उपकारों पर 

               उसे हानि पहुँचाने का  अर्थ  होगा

             अपने ही विनाश को आमंत्रित करना  


             मनायें पृथ्वी दिवस अतः सच्चे मन से

            उसके संरक्षण  का शुभ  - संकल्प  लेकर,

             सौंप सकें  जिस से आने वाली पीढियों  को

             सुरक्षित भविष्य की अनमोल विरासत....

             

              

                 

               


             

         



  


           

          

       

       

      

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

आज की चिंता


 पिछले कई महीनों से 

टेलीविज़न के परदे पर छाये रहते हैं

युद्धभूमि के विचलित कर देने वाले  दृश्य

 विद्युत - गति से एक छोर से दूसरे की ओर

 सनसनाते  मिसाइल, राकेट और बम वर्षक विमान


    रह - रह कर गड़गड़ाहट से थर्राता आकाश,

    और अप्रत्याशित बमवर्षा को झेलती धरती 

     धूल,  धुएं  और आग की लपटों  के बीच

    प्राण बचाने को  बदहवास  इधर -उधर भागते

    निर्दोष नागरिक.


      नित्य प्रति की सामान्य दिनचर्या पर 

     आतंक की  काली छाया  घिरते देख

     स्वयं से प्रश्न करते आबाल वृद्ध, नर, नारी

     कि क्या है उनका दोष  जो झेलनी पड़ रही है

      यह घोर आपदा!


      चूंकि हिंसा  सदैव उकसाती है प्रतिहिंसा को

     और प्रतिशोध का  क्रोधी पशु तो 

     सदैव सक्रिय रहता है अतीत को दुहराने के लिये 

     अतः कब और कहाँ जाकर रुकेगा यह संघर्ष

      यह बता पायेगा केवल भविष्य!


       जानती हूँ कि  निरर्थक है आशा करना

       कि शीघ्र  समाप्त हो जायगा यह उन्मादी  दौर 

        फिर भी, चाहती हूँ कि हो कोई चमत्कार

       और सदबुद्धि  मिले इन युद्ध -रत पक्षों को 

       सद्भावना पूर्वक  अपने विवादों को सुलझाने की.


        ताकि हो सके सके इस  धरती पर 

        शांतिपूर्ण सह - अस्तित्व के स्वर्णिम युग का आविर्भाव 

       और सुरक्षित हो सके मानव मात्र का अस्तित्व

       अविवेकी हिंसा और विनाश के दुष्प्रभाव  से.

  


        





      

     

     


       

    

सोमवार, 11 दिसंबर 2023

निर्झरिणी ---- कविता संग्रह




अनुक्रमणिका oo

अ-  नि: सर्ग की छवियां

-  हे  हिमालय!

२- यात्रा-- पर्वत पुत्री की

३ - पहाड़ की नारी 

४ - फूलों की घाटी

५ - निर्झरिणी

६ नदी की का रास्ता 

७ - वृक्ष 

 ८- सागर-दर्शन 

९ - इन दिनों

10  -मकर संक्रांति

११ - वासन्तिका 

१2 --ग्रीष्म का आतप

१3 ---  बरखा रानी

 १४ -- सूर्यास्त की बेला

१५  -- आकाश गंगा

१६  --जागती रहती है रात


ब ---  जीवन - संगीत

१ -- स्वागत, नव वर्ष 

२- आशा  के स्वर

३- मेरे शब्द

४-- गुलाब की आत्मकथा   

५-  कविता, अकविता

६-- छोटी सी बात

७- बुझने न देना  कभी - 

८-   सबसे सुन्दर कविता 

९ -- पतझड़ के बाद

१० -- गौरय्या  की जिद्द

११ - गिरगिट  उवाच 

१२ -  वह सामूहिक संगीत


 स -- श्रद्धा - सुमन 

 १ -  दृष्ट से अदृष्ट की ओर

   २  -  प्रार्थना

   ३ -- ईश्वर  ने नहीं किया...

   ४ - राम, तुम्हें प्रणाम!

   ५ -  अवध के राम

   ६ - -   संत वैज्ञानिक  कलाम

   7 -- चिर - स्मरणीया माँ 



 द - विविधा

 १ - आतंकवाद

  २ - आज के संदर्भ में 

 ३  - हिरोशिमा  की चेतावनी 

 ४- युद्ध के बाद 

५ -दुनिया  को नहीं चाहिये

६ - माता भूमि:  ....   (विश्व पृथ्वी दिवस २२अप्रैल पर )


रविवार, 10 दिसंबर 2023

हिरोशिमा


     मैं हिरोशिमा!

   मानव -सभ्यता के इतिहास में

   मानव द्वारा मानव के प्रति किये गए 

   सबसे बड़े आपराधिक  कृत्य का

    जीवंत साक्षी.


    याद दिलाना चाहता हूँ  आज 

   एक और महायुद्ध की आशंकाओं से घिरे

   विश्व समुदाय को,  उस दुर्भाग्य पूर्ण  दिन की 

    जब  मुझ पर प्रहार किया गया था 

   सर्वाधिक घातक, विनाशकारी अस्त्र 

    परमाणु बम से .

 

     अगस्त माह की वह  सुहानी सुबह

     जो  शुरुआत थी  एक सामान्य दिन की 

     अचानक ही बदल गई थी दुखों की 

      भयानक  काली,  अँधेरी रात में.


        जब स्वच्छ, निरभ्र आकाश में अकस्मात 

        प्रकट हुआ एक दैत्याकार मशरूम

        जिसने ढक दिया सूरज को भी अपनी कालिमा से 

        और फिर धरती पर उतर कर 

         लिख डाली गाथा मेरे महाविनाश की.


        रेडियोधर्मी धूल, धुएं और आग के  बने

        उस विशालकाय क्रूर दानव ने

        अपने  विशाल पंजों में जकड़  कर 

        तहस नहस कर डाला मेरे अस्तित्व को.


     जब केवल मानव ही नहीं, सारे पशु -पक्षी,

    पेड़ - पौधे, घर आँगन,स्कूल, बाज़ार, कारखाने,

   अस्पताल  और पूजा स्थल तक भी बदल गए थे राख के ढेरों में

   और  मैं, एक जीता जागता शहर,देखते ही देखते

     बन गया था  एक विशाल श्मशान.

    

         बीत गए हैं तब से अनेक दशक 

        और  दब  कर  रह गयी हैं,

        उस अभूतपूर्व त्रासदी की मर्मान्तक कहानियाँ

        इतिहास के निर्जीव पन्नों में.

 

            किन्तु मैं नहीं भूला कुछ भी

           और एक भयानक दुःस्वप्न की तरह 

           आज तक पीछा करती रहती हैं मेरा 

            उस दिन की  दर्दनाक  स्मृतियाँ 

          


            जिसमें हुई जन -धन की अपार हानि का

            कभी नहीं हो सकता  समुचित आकलन,

            जिसमें मिले घाव भर नहीं पाएंगे 

            आने वाली कई सदियों तक.

            

                और वर्तमान में,

                फिर एक परमाणु  युद्ध की आशंका 

                कर रही  मुझे विचलित, और विवश 

                याद दिलाने दुनिया को, अपनी  त्रासद  कहानी

                जिसकी पुनरावृति नहीं होनी चाहिए 

                किसी भी हाल में.

              


              आज के सारे युद्ध - रत  शासकों को  देने चेतावनी!

              कि उनमें से किसी के अविवेकी निर्णय से 

               इस सुन्दर धरती पर फिर से 

              कोई  और शहर, हिरोशिमा न बन जाए.

            

             

             

    

        

         

         

       


      


      

शनिवार, 9 दिसंबर 2023

आशा के स्वर


 आशा के स्वर

यूँ तो मधुर होते हैं सदैव ही

किन्तु लगते हैं और भी अधिक कर्णप्रिय 

 जब निराशा के घनीभूत अंधकार में 

 नहीं दिखाई देता कोई भी रास्ता  


  सुनाई देते हैं ये उस एम्बुलेंस के सायरन में 

  जो भाग रही होती है बेतहाशा अस्पताल की ओर 

   दुर्घटना के शिकार घायलों को लेकर 

   ताकि बचाये जा सकें  उनके अमूल्य जीवन


  फायर ब्रिगेड की लगातार बजती घंटियों में

   जो दौड़ रही होती है घटनास्थल की ओर 

  अग्नि की विनाशकारी लपटों  से जूझ कर 

   जान -माल  की हानि  को रोकने.


   

 ग्रीष्म की चिलचिलाती  दोपहरी में 

राहत का सन्देश लेकर, अचानक ही

क्षितिज पर उमड़ आये  बादलों की 

 चिर - प्रतीक्षित  गड़गड़ाहट में.


     

     लम्बी  प्रतीक्षा के बाद 

    प्रसूति गृह से आती नवजात की किलकारी में 

   जो  संकेत देती अपार संभावनाओं  से पूर्ण 

    एक नये जीवन के आरम्भ का.


    आशा के स्वर होते हैं भिन्न एक दूसरे से

     किन्तु एक गुण  में हैं  वे समानधर्मी

     बहता रहता  है उन सबके  अंतर में

      जीवन- संघर्ष का सुमधुर संगीत.




    

   

  



गुरुवार, 9 नवंबर 2023

युद्ध के बाद


                युद्ध  की समाप्ति पर

               शेष रह जायेगा ऐसा क्या

              जिसे  देख - सुनकर सुख पाओगे

              और गर्व कर सकोगे तुम 

              अपनी तथाकथित उपलब्धियों पर?


                रह सकोगे संतुलित देख कर भी

                सर्वत्र बिखरे विनाश के चिह्न

               जिनके मौन में भी मुखरित हो रहा होगा

               निर्दोष पीड़ितों का करुण क्रन्दन ?


                   विचलित नहीं करेंगे क्या तुम्हें

                   खंडहर बने घर, स्कूल, बाज़ार

                   मलबे में बदली ऊँची इमारतें

                  और लावारिस पड़े अनगिनत शव?


                   श्मशान की सी शांति के बीच भी

                   गूँजेंगे नहीं क्या तुम्हारे कानों में

                  असमय ही प्रियजनों  को खो देने वाले

                  शोक -संतप्त लोगों के मर्मभेदी विलाप?


                   कौन विजयी होता है, कौन पराजित

                  यह जानने में तनिक भी रूचि नहीं मेरी

                  चाहती हूँ बस कि लगे पूर्ण विराम शीघ्र 

                   इस अंतहीन प्रतीत होते संघर्ष पर.

              

                    सर्व -विदित हैं  कि युद्ध  नहीं स्थायी समाधान

                  किसी भी विवाद का, और निश्चित ही 

                  घातक  और दूरगामी होते  हैं उसके परिणाम,

                  सभी सम्बन्धित पक्षों के लिये.

               


                    सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद  भी

                   समय तो बचा ही रहेगा यह पूछने  कि --

                  युद्ध की विभीषिका में पल रहे बचपन के लिये,

                  किस तरह के भविष्य की नींव रख रहे हो तुम?


              

              

           ( विश्व के हर युद्ध -रत देश के लिये, किसी का भी पक्ष लिये बिना )

              Photo by

             Jordy Meow on unplash

      

सोमवार, 6 नवंबर 2023

इंद्रधनुष


                 इन्द्रधनुष  करते हैं आश्वस्त

                कि रंग कभी भी विलुप्त नहीं होंगे. 

                   प्रकृति के अक्षय भण्डार में

                   रहेंगें  वे सदैव संरक्षित.

               

         

                      और समय -समय  पर 

                प्रकट होते रहेंगे दिव्य आभा के साथ 

                    क्षितिज के  चित्र - फलक पर

                  सप्तवर्णी इन्द्रधनुओं  के रूप में ,

              


               जब भी सूरज ओर वर्षा मिलकर

                खेल -खेल में  बना  देंगे 

              एक सुन्दर  किन्तु अस्थायी सेतु 

               धरती और आकाश के बीच.


                      इंगित करते रहेंगे यह भी 

                 कि प्रकाश की  हर एक किरण

                 संजोये रखती है अपने अंतस में

                सप्ताधिक रंगों का विपुल  संसार,


               और रचती रहती है ऐसे अलौकिक दृश्य

                जो अपनी क्षणिक उपस्थिति से भी 

                विस्मय -मिश्रित आनंद भर देते हैं 

                  वातावरण के कण - कण में.

                    

        

                         


                   

Cover of the upcoming book