शुक्रवार, 17 मई 2024

याचना


  हे मेरे प्रभु! 

 करती हूँ  विनम्र याचना 

कि मिटा डालो समूल 

मेरे ह्रदय की दरिद्रता को 

उस पर निरंतर प्रहार करके


शक्ति दो मुझे देव, कि  -

सुख दुख दोनों को ही 

समान भाव से सहज रहकर 

सहन कर सकूँ.


शक्ति दो कि निर्बलों, निर्धनों 

से कभी विमुख न होऊँ 

और न कभी घुटने टेकूँ 

धृष्ट और दम्भी शक्तियों के समक्ष.


 यह भी कि मन मस्तिष्क को  

उठा सकूँ  बहुत  ऊपर 

नित्य प्रति की क्षुद्र बातों से 

ताकि रहूँ उनसे  सदैव अप्रभावित 

 


 शक्ति दो कि अपने प्रेम को 

सेवा में परिणत कर फलीभूत कर पाऊँ 

और कर सकूँ स्वयं को समर्पित तुम्हें 

सम्पूर्ण प्रेम के साथ.



गुरुदेब रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का हिंदी रूपांतर 

(गीतांजलि 38)

रविवार, 14 अप्रैल 2024

अँधेरे से उजाले की ओर


 घोर निराशा के पलों  में 

 हम देख नहीं पाते अक्सर 

काले, घने,  बादलों के पीछे छुपी 

सुनहरी किरणों का सच.


   पर,अंधेरा कितना भी घना हो

   टिक नहीं सकता लम्बे समय तक 

   सूरज की अदम्य ऊष्मा और 

    प्रभामण्डल के समक्ष.


     अँधेरे - उजाले का  यह खेल 

    चला आ रहा आदिकाल से, और 

    चाहे अनचाहे  सभी  को बनना पड़ता है 

    इसमें प्रति भागी.

    

      यद्यपि  सुख का एक द्वार बंद होने पर 

      प्रायः खुल जाता है कोई दूसरा द्वार भी 

      किन्तु दुख में डूबी हमारी ऑंखें 

      देखती रहतीं हैं देर तलक बंद किवाड़ों को ही.


     और देख नहीं पातीं उस नये द्वार को 

      जो खुल गया है हमारे सामने 

      सुखद संभावनाओं से भरे भविष्य की 

      झलकियाँ  दर्शाता.

      

     



  



शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

श्रद्धा - सुमन (4)



      1 .    प्रार्थना

       2.  दृष्ट से अदृष्ट की ओर

      3 .   ईश्वर ने नहीं किया यह वादा...

       4 .    राम  , तुम्हें प्रणाम

       5.    अवध की दीपावली

        6.    संत वैज्ञानिक

        7.   चिर - स्मरणीया माँ

        8.     आभार 

विविधा (3)


               1.    माता भूमि : पुत्रो अहं पृथिव्या :

                2.  आज की चिंता 

                3.   आतंकवाद

                4.   दुनिया को नहीं चाहिए...

                5.    हिरोशिमा की चेतावनी

                 6.   युद्ध के बाद


            

                

जीवन संगीत (2 )



        1.      स्वागत, नव - वर्ष

        2.     आशा की ध्वनियाँ

        3.      प्यारी बेटियाँ 

        4 .      मेरे शब्द

        5 .  कविता - अकविता

        6.   सबसे सुन्दर कविता 

        7 .   छोटी सी बात

         8.  बेटी के अधिकार 

        9 .    अंदर की चिंगारी

        10.    गौरय्या की जिद्द

        11.    गिरगिट उवाच

       12.     पतझड़ के बाद

       13.     गुलाब की आत्म - कथा

      14.   कोविड काल की एक दोपहर

       15.    गाँव वाला घर

       16.  विदा होता हुआ साल 

       

निः सर्ग की छवियाँ ( 1 )


    

1.  हे हिमालय

2. पर्वत - पुत्री

3. पहाड़ की नारी

4.   निर्झरिणी

5 .  नदी का रास्ता

6.  फूलों की घाटी

7 .  वृक्ष

8 .   सागर दर्शन

9 .  जाड़े के दिन

10 .   दिसम्बर की धूप 

11 .    मकर संक्रांति

12 .    वसंत की आहट

13.   स्वागत, ऋतुराज!

14.   ग्रीष्म का आतप

15 .    बरखा रानी

 16 .  इंद्र धनुष 

17 .  सूर्यास्त की बेला

 18 .    आकाश गंगा

  19.   जागती रहती है रात   

  20 .   हे ज्योतिपुंज!

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

आभार


              आभार उन सबका जो मिले जीवन पथ पर

                और किया मुझे उपकृत अपने -अपने ढंग से.


                श्रद्धावनत हूँ सर्वप्रथम  माता - पिता के प्रति

                पाया जिनसे अनमोल  उपहार जीवन का.

                 

                   कृतज्ञ हूँ परिवार के सब वरिष्ठ जनों की

               मिला सदा जिनसे भरपूर स्नेह और  सम्बल 


               ऋणी हूँ सदैव  गुरुजनों, शिक्षकों की

              मिला जिनसे आशीष और अमूल्य विद्या -धन


              आभार है  मित्रों, परिचितों, स्वजनों का

                   बढ़ाते रहे जो  मनोबल निरंतर 


                    चिर -आभार माता जैसी  प्रकृति का

                  पालन करती जो समस्त प्राणी जगत का


                  परम  पिता परमेश्वर को बस विनम्र नमन 

                 क्योंकि शब्द नहीं हैं कृतज्ञता ज्ञापन  में सक्षम


                  उस सब के लिये जो पाया जन्म लेकर

                   विविधता से भरी इस  अद्भुत यात्रा में.  


          


              

              

            

             

Cover of the upcoming book