शुक्रवार, 1 मई 2026

Hope Is The Thing With Feathers


         उम्मीद -- 

वह नन्ही सी चिड़िया 

जो निवास करती है 

मन की गहराइयों में -

और  गुनगुनाती रहती  निरंतर 

   शब्दहीन गीत।

 


 सुनाई देता है 

उसका मधुरतम संगीत  -

आँधियों के शोर में भी।

भला कौन सा तूफान -

विचलित कर पायेगा उसे,   

 जो रखती अनगिनत ह्रदयों को 

प्राण - ऊष्मा से  आप्लावित ?


 मैंने  सुना है उसका गान  -

  हिमशीतल  प्रदेशों में -

 और अजनबी समुद्रों के बीच --

  किन्तु विषमतम परिस्थिति  में भी -

   नहीं माँगा उसने मुझसे -

    रोटी का एक टुकड़ा।




Hindi translation of Emily Dickinson's poem " Hope Is The Thing With Feathers "

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

करुणा


                           करुणा -- 

                   मानव मन की सुकोमल भावना 

                 जो नहीं स्वीकारती  कोई बंधन,

                 स्वर्ग  से धरती पर  निःशब्द  झरती -

                वर्षा की शीतल बूंदों की तरह.


               साथ लाती  दोहरा वरदान -

               जो धन्य करता  -

               पाने वाले के साथ साथ -

               देने वाले को भी. 

     

                     करुणा -- 

                  शक्तियों में परम शक्ति  -

                जो  शोभती किसी सम्राट के शीश पर -

                उसके राजमुकुट से भी  अधिक।


                 राजदंड तो होता प्रतीक -

                 सांसारिक शक्ति का -

                जो उत्पन्न करता  दूसरों में 

                  भय और आतंक।


                 किन्तु करुणा  निवास करती --

                राजाओं के अंत:स्थल में -

                ईश्वरीय गुण का रूप धारण कर।


                 इसलिए जब- जब अनुप्राणित होता -

                राजा का न्याय -

                करुणा की  भावना से -

     

               तब - तब सांसारिक सत्ता भी -

               प्रतीत होने लगती है --

               ईश्वर के समकक्ष ही.



        विलियम शेक्सपियर की कविता  ' The Quality Of Mercy' का भावानुवाद.


                

                 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपराजेय


     उस  काली रात से निकलकर -

    जो चारों ओर से मुझे घेरे है--

    मैं आभार करता हूँ -

   उन ज्ञात - अज्ञात देवताओं का -

    जिनकी कृपा से मिली है मुझे -

    मेरी यह अजेय आत्मा.


      अनगिनत आपदाओं की 

       कठोर गिरफ्त में भी मैं --

      कभी विचलित नहीं हुआ -

      और न  ही किया  मैंने 

       करुण विलाप.

   

     दुर्योग  के कठोर प्रहारों से -

     रक्तरंजित भले ही हुआ मेरा शीश,

     किन्तु झुका नहीं -

      कभी भी.


      क्रोध और अश्रुओं से भरी इस दुनिया में -

       सर्वत्र व्याप्त है  अंधकार  का भय 

       किन्तु  राह में आते  संकटों  ने -

       मुझे सदैव निर्भीक पाया  -

      और यही होगा भविष्य में भी.

     


      किंचित परवाह नहीं मुझे, कि -

     कितना दुर्गम होगा मेरा रास्ता -

      कितने अभियोग, कितने दंडादेश 

       अंकित हैं मेरे  भाग्य -लेख में,

    

       मुझे  विश्वास है  कि -

       मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ -

        और अपनी अजेय आत्मा का- 

         नियंता भी.


      A sense transcreation of  " INVICTUS "  by  William Ernest Henley 

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

पतझड़ में



                 सच  है  कि बहुत अच्छी लगती हैं,

                वे चमकदार हरी पत्तियाँ -

                 पेड़ों का श्रृंगार बनी जो

                झूमती रहतीं  हवाओं  में,

               जीवन- संगीत की लय पर.


               किन्तु, देखा है कभी ठहर कर-

               उन पीले, सूखे पत्तों को भी,

               जो अपना जीवन चक्र पूरा कर,

               बिखरे पड़े होते हैं धरती पर,

               अंतिम समर्पण में?


            काल के सुनियोजित क्रम में

           पूर्व- निर्धारित है उनका  भी

             विश्व -रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा,

           निर्विरोध,चुपचाप नीचे उतर जाना

           जीवन- नाटक के हर पात्र की तरह.

         

           इसलिए यह छोटा सा निवेदन कि--

          जब कभी गुज़रना हो किसी ऐसे रास्ते से-

       जहाँ बिखरे पड़े हों  में पीले, सूखे पत्ते,

       तो तनिक सँभाल कर रखना अपने कदम,

         ताकि आ न जायें वे पैरों के नीचे.


           इतना आदर तो  देना ही होगा उन्हें,

            जो जीवन भर निः स्वार्थ सेवा करते रहे , 

           सुलभ कराते रहे हमको जीने के सम्बल, 

           मात्र फल -फूल, शीतल छाया ही नहीं-

           साँसों की साँस, अदृश्य प्राण - वायु भी.


             

छाया चित्र, साभार

विनेश पोसवाल



गुरुवार, 16 जनवरी 2025

तीर पर कैसे रुकूँ मैं

 क्षितिज तक लहरा रहा चिर -सजग सागर 

  संजोये अपनी अतल गहराइयों में 

  शंख,मुक्ता,हीरकों  के कोष दुर्लभ 


दौड़ती आतीं निरंतर बलवती उद्दाम लहरें 

 लौट जातीं कुछ न कह कर, किन्तु लगता 

 कर रहीं उपहास मेरी भीरुता का


 " पा सकोगे कुछ वहाँ पर बैठ कर तुम 

 यदि नहीं आगे बढ़े तज कर किनारे?

 बिना पैठे ही गहन जलराशि में क्या 

  हाथ आयेंगे कभी मोती तुम्हारे?"

  


   यह चुनौती है कि अवसर,

  मिटेगा अस्तित्व या मोती मिलेंगे,

  जान पाना है कठिन,

   जब तक न जा उनसे मिलूँ मैं,

   

     तीर पर कैसे रुकूँ मैं ?










बुधवार, 11 सितंबर 2024

नदी का भय



    कहते हैं सागर के निकट पहुँचने  पर-

    उसमें मिलने से पहले-

     एक अनाम भय से  -

   काँप उठती है नदी।


      याद  करने लगती है  उन पर्वत शिखरों को-

       जहाँ से निकल पड़ी  थी कभी-

      बाल- सुलभ उत्सुकता से-

      कुछ  नया ढूंढने की  चाह  में।


     उस लम्बे ,घुमावदार रास्ते-

     और  उसमे मिलने  वाले-

     अनगिनत जंगलों और बस्तियों को-

     जिन्हें पार कर यहाँ तक पहुंची है।


    और अब फैली है उसके सामने-

     दिगंत तक लहराती यह  अगाध जलराशि   -

     जिस में प्रवेश करने का अर्थ होगा-

    सदा,सदा के लिए अदृश्य हो जाना।


   तो अब क्या करे नदी? कैसे बचाए अपना अस्तित्व?

   पीछे तो लौट नहीं सकती,

   और अन्य कोई मार्ग  दिखाई नहीं देता -

    दूर -दूर तक।



     प्राण  रहते वापस जाना संभव नहीं-

     और नहीं है कोई अन्य विकल्प  भी -

     समुद्र में प्रवेश करने का जोखिम

      उठाना ही पड़ेगा नदी को।


      शायद तब ही मुक्त हो पायेगी-

     इस भय और दुविधा के भ्रम जाल   से-

    और स्वयं अनुभव करेगी -

     एक नए अस्तित्व में  प्रोन्नत होने का सुख।


    जान जाएगी  कि सागर में मिल जाना -

    अस्तित्व विहीन  होना नहीं होता -

    बल्कि उसके साथ एकाकार होकर

     स्वयं सागर बन जाना होता है!!

       

    


Transcreated from Khalil Gibran's   ( 1883-1931) poem  ' Fear '  


   खलील जिब्रान की यह कविता नदी और सागर के माध्यम से अस्तित्व, परिवर्तन और atm- विलय के गहरे रहस्य को अभिव्यक्त करती है। अपने परिचित मार्ग और अस्तित्व को पीछे छोड़कर सागर से मिलने से पहले नदी के भीतर एक अनाम भय और दुविधा जन्म लेती है। वह पीछे लौट नहीं सकती और आगे बढ़ने के अतिरिक्त उसके पास कोई विकल्प नहीं है। इसी भाऊ के पार उसे एक नए सत्य का बोध होता है -- सागर में मिल जाना अपने अस्तित्व को खो देना नहीं, बल्कि एक व्यापक अस्तित्व में प्रोन्नत होकर स्वयं सागर बन जाना होता है 
यह कविता हमें बताती है कि जीवन में परिवर्तन के क्षणों में उपजा भय  कई बार किसी अंत का संकेत नहीं, अपितु एक नए और बेहतर अस्तित्व की ओर यात्रा का आह्वान होता है 

   

    

शुक्रवार, 17 मई 2024

याचना


  हे मेरे प्रभु! 

 करती हूँ  विनम्र याचना 

कि मिटा डालो समूल 

मेरे ह्रदय की दरिद्रता को 

उस पर निरंतर प्रहार करके


शक्ति दो मुझे देव, कि  -

सुख दुख दोनों को ही 

समान भाव से सहज रहकर 

सहन कर सकूँ.


शक्ति दो कि निर्बलों, निर्धनों 

से कभी विमुख न होऊँ 

और न कभी घुटने टेकूँ 

धृष्ट और दम्भी शक्तियों के समक्ष.


 यह भी कि मन मस्तिष्क को  

उठा सकूँ  बहुत  ऊपर 

नित्य प्रति की क्षुद्र बातों से 

ताकि रहूँ उनसे  सदैव अप्रभावित 

 


 शक्ति दो कि अपने प्रेम को 

सेवा में परिणत कर फलीभूत कर पाऊँ 

और कर सकूँ स्वयं को समर्पित तुम्हें 

सम्पूर्ण प्रेम के साथ.



गुरुदेब रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का हिंदी रूपांतर 

(गीतांजलि 38)

रविवार, 14 अप्रैल 2024

अँधेरे से उजाले की ओर


 घोर निराशा के पलों  में 

 हम देख नहीं पाते अक्सर 

काले, घने,  बादलों के पीछे छुपी 

सुनहरी किरणों का सच.


   पर,अंधेरा कितना भी घना हो

   टिक नहीं सकता लम्बे समय तक 

   सूरज की अदम्य ऊष्मा और 

    प्रभामण्डल के समक्ष.


     अँधेरे - उजाले का  यह खेल 

    चला आ रहा आदिकाल से, और 

    चाहे अनचाहे  सभी  को बनना पड़ता है 

    इसमें प्रति भागी.

    

      यद्यपि  सुख का एक द्वार बंद होने पर 

      प्रायः खुल जाता है कोई दूसरा द्वार भी 

      किन्तु दुख में डूबी हमारी ऑंखें 

      देखती रहतीं हैं देर तलक बंद किवाड़ों को ही.


     और देख नहीं पातीं उस नये द्वार को 

      जो खुल गया है हमारे सामने 

      सुखद संभावनाओं से भरे भविष्य की 

      झलकियाँ  दर्शाता.

      

     



  



शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

श्रद्धा - सुमन (4)



      1 .    प्रार्थना

       2.  दृष्ट से अदृष्ट की ओर

      3 .   ईश्वर ने नहीं किया यह वादा...

       4 .    राम  , तुम्हें प्रणाम

       5.    अवध की दीपावली

        6.    संत वैज्ञानिक

        7.   चिर - स्मरणीया माँ

        8.     आभार 

विविधा (3)


               1.    माता भूमि : पुत्रो अहं पृथिव्या :

                2.  आज की चिंता 

                3.   आतंकवाद

                4.   दुनिया को नहीं चाहिए...

                5.    हिरोशिमा की चेतावनी

                 6.   युद्ध के बाद


            

                

जीवन संगीत (2 )



        1.      स्वागत, नव - वर्ष

        2.     आशा की ध्वनियाँ

        3.      प्यारी बेटियाँ 

        4 .      मेरे शब्द

        5 .  कविता - अकविता

        6.   सबसे सुन्दर कविता 

        7 .   छोटी सी बात

         8.  बेटी के अधिकार 

        9 .    अंदर की चिंगारी

        10.    गौरय्या की जिद्द

        11.    गिरगिट उवाच

       12.     पतझड़ के बाद

       13.     गुलाब की आत्म - कथा

      14.   कोविड काल की एक दोपहर

       15.    गाँव वाला घर

       16.  विदा होता हुआ साल 

       

निः सर्ग की छवियाँ ( 1 )


    

1.  हे हिमालय

2. पर्वत - पुत्री

3. पहाड़ की नारी

4.   निर्झरिणी

5 .  नदी का रास्ता

6.  फूलों की घाटी

7 .  वृक्ष

8 .   सागर दर्शन

9 .  जाड़े के दिन

10 .   दिसम्बर की धूप 

11 .    मकर संक्रांति

12 .    वसंत की आहट

13.   स्वागत, ऋतुराज!

14.   ग्रीष्म का आतप

15 .    बरखा रानी

 16 .  इंद्र धनुष 

17 .  सूर्यास्त की बेला

 18 .    आकाश गंगा

  19.   जागती रहती है रात   

  20 .   हे ज्योतिपुंज!

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

आभार


              आभार उन सबका जो मिले जीवन पथ पर

                और किया मुझे उपकृत अपने -अपने ढंग से.


                श्रद्धावनत हूँ सर्वप्रथम  माता - पिता के प्रति

                पाया जिनसे अनमोल  उपहार जीवन का.

                 

                   कृतज्ञ हूँ परिवार के सब वरिष्ठ जनों की

               मिला सदा जिनसे भरपूर स्नेह और  सम्बल 


               ऋणी हूँ सदैव  गुरुजनों, शिक्षकों की

              मिला जिनसे आशीष और अमूल्य विद्या -धन


              आभार है  मित्रों, परिचितों, स्वजनों का

                   बढ़ाते रहे जो  मनोबल निरंतर 


                    चिर -आभार माता जैसी  प्रकृति का

                  पालन करती जो समस्त प्राणी जगत का


                  परम  पिता परमेश्वर को बस विनम्र नमन 

                 क्योंकि शब्द नहीं हैं कृतज्ञता ज्ञापन  में सक्षम


                  उस सब के लिये जो पाया जन्म लेकर

                   विविधता से भरी इस  अद्भुत यात्रा में.  


          


              

              

            

             

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

बेटियाँ


         प्यारी बेटियों!

     ईश्वर की सुन्दरतम रचना हो तुम

      निर्दोष  और चित्ताकर्षक है--

      तुम्हारी भोली चितवन.


      जैसे सूरज और चाँद की किरणेँ  

     घुल मिल  कर ओस की बूंदों में

     चमक रही हों  फूलों की पंखुड़ियों पर

      उगते सूरज की रौशनी में.




      तुम्हारा जन्म, जैसे

     स्वयं परमेश्वर की इच्छा से 

     धरती पर  होने वाली 

     सर्वाधिक आनंदमयी घटना.


       होगा उस परम रचयिता को भी गर्व 

      तुम्हें अस्तित्व में लाने पर,

      क्योंकि उसके अप्रतिम  कौशल की ,

       सजीव  प्रतिमा हो तुम .

       

       

       

        

        

 

         

        


        

विदा लेता साल


         बीतने को है एक और वर्ष

         समाता जा रहा है धीरे धीरे 

        अतीत की अतल गहराइयों में

         विदा लेकर वर्तमान से.


          उसके जाने से रिक्त हुई जगह

          भरती जाएगी स्वतः ही

           आने वाले समय  की

           गतिविधियों, घटनाओं से.


          विश्व रंग - मंच पर घटित होने लगेंगे फिर

          जीवन के विविध क्रिया कलाप

           एक दूसरे का अनुसरण कर रहे 

           सूर्य, चंद्र की  अनंत छाया  में.


            घूमता रहेगा अहर्निंश गति -चक्र काल देव का 

            धूप - छाँव, अँधेरे - उजालों को बाँटता 

            मिलन की उत्सवी खुशियों के साथ साथ 

             दुख -दर्द, विछोह की पीड़ा भी लाता.


            विदा होता हर वर्ष  दे जाता  सन्देश 

            कि जीवन है  फूल - काँटों  से भरी डगर 

            चलना होगा इस पर  सदा संतुलित रह कर

            सरल होगा  सफ़र, यह सत्य  यदि गुन लो.

             

            

         

             

            

            

             


   

            

            

            

            


            


 

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

अभिनन्दन ऋतुराज !!


         ऋतुराज वसंत!

      सुखद परिवर्तन का सन्देश वाहक 

      धरा पर अवतरित होता है जो 

      राजसी वैभव के साथ.


        जिसकी  पगध्वनि  सुनते ही 

          शुरू हो जाता  शीत काल का पराभव 

         समेटने लगता वह  ताम - झाम अपना 

        सत्ता - परिवर्तन की आहट  भर पाकर


         हटा देता सूरज  भी कुछ निकट आकर

          चारों ओर  छाया कुहासे का आवरण

         पोंछ  देतीं उसकी असंख्य स्वर्ण  किरणेँ

           धरती के मुख पर जमे  तुषार कण


         नींद से जाग उठती  प्रमुदित, प्रफुल्लित  वह 

          करने स्वागत मनभावन अतिथि का 

           प्रसन्न -मन प्रकृति भी आ जुटती सखी सी 

           सँवारने  को फिर से उसका घर आँगन.


            

बुधवार, 31 जनवरी 2024

बालिका दिवस पर


  उसका भी अधिकार है

  जन्म लेने का

 आने दो  सुरक्षित

  उसे  संसार में.


       माँ की गोद में आकर

     अधिकार है उसे  विकसित होने का

      मत काटो निर्दयता से 

      उसके जीवन की डोर को.


      निरन्तर आगे  बढ़ते जाना 

      उसकी भी प्रकृति है,

       जाने दो निर्बाध उसे 

      अपने चुने हुए पथ पर 


       अवरोधक मत बनो

       उसकी प्रगति यात्रा में 

       हो सके तो सहायक बन कर

       सँवारो उसका जीवन.


        

दिसंबर की धूप


 दिसंबर की धूप  --

जैसे स्वर्ग से उतरी कोई स्वर्णपरी

 धरती के मुख पर जमे  तुषार कणों को

 पोंछती अपने कोमल स्पर्श से.


    दिसंबर की धूप  --

    जैसे  ग्रीष्म के अत्याचारों से त्रस्त 

    धरती की प्यास बुझाने उतरतीं 

     सावन की पहली ठंडी बौछारें.


      दिसंबर की धूप  --

     जैसे लम्बे अरसे से  बेरोजगार युवक के लिये 

     नौकरी का नियुक्ति पत्र लाता

      चिर - परिचित डाकिया.

      

      


      दिसंबर की धूप  --

      जैसे जाड़े की रात में फुटपाथ पर

      कांपते भिखारी को मिलने वाला

      गर्म कम्बल का अप्रत्याशित  उपहार.


      दिसंबर की धूप  --

     जैसे युद्ध में लापता सैनिक के परिवार को

     उसके सुरक्षित  होने की शुभ- सूचना देता

      सरकारी सन्देश 

       

      

     

      

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

गाँव वाला घर


 दूर पर्वतों की तलहटी  में

वर्षों से अकेला खड़ा है वह मकान

जो कभी था हँसता, खेलता, प्यारा घर

 एक बड़े परिवार का.


यद्यपि अनाकर्षक लगता है वह आज 

उसका आकार और बनावट कहते हैं 

 कि बड़े परिश्रम और कौशल  से निर्मित 

 किया गया होगा उसे कभी.


   तभी तो वर्षों की उपेक्षा के बावजूद

    खड़ा है आज भी अपनी जगह पर

    बिना कोई  शिकायत  किये 

    पहले जैसी ही गरिमा के साथ.

      


        वर्षों से धूप,आँधी -पानी की मार झेलता 

        संजोये है उस स्वर्णिम दौर की यादों को

        अपने अन्तः स्थल में सुरक्षित 

        किसी अनमोल ख़ज़ाने की तरह

       


       दशकों तक उस परिवार का  अंग  बन कर

       भागी रहा होगा उसके  विविध रंगों का 

       कभी जन्म और विवाह के उमंग उल्लास,

       कभी विछोह की दुखदायी अनुभूति का.


         बड़े से आँगन में अंकित हैं  स्मृतियाँ

         पारिवारिक सौहार्द और  धूप छाँव की 

        शिशुओं की मीठी किलकारियों के साथ साथ 

        बड़े से रसोईघर के बर्तनों की खट -पट  भी 


          देखा होगा इसने बच्चों को बड़ा होते हुए 

         आपस में खेलते, प्यार करते, झगड़ते हुए 

         और युवा होने पर नई खुशियों की तलाश में 

           घर छोड़ कर गगन में उड़ान भरते हुए.


           एक -एक कर  छोड़ गए सब इसको अकेला 

           जीता है अब सिर्फ यादों के सहारे

            पर उत्सुक भी रहता सुनाने अपनी कहानी 

            इधर से गुजरते  हर  आते जाते को.


            थोड़ी सी फुर्सत और धीरज अगर  हो तो 

            कुछ देर ठहर कर सुन लें इसकी  बातें,

           हो सके तो थोड़ी सी सहानुभूति भी दर्शा दें 

            इसे इसके हाल पर छोड़  जाने से पहले


           देखने लगेगा राह  फिर आँखें  बिछाये

           इस उम्मीद में कि किसी एक अच्छे दिन 

           लौट कर आयेगा इस घर का कोई यहाँ

          अपने बचपन की मीठी यादों को  दोहराने.


         और सार्थक होगी इसकी लम्बी प्रतीक्षा

        कहते हैं समय चक्र  घूमता रहता सदा ही

          और इस अनवरत गति शीलता के क्रम में 

          दोहराता रहता है स्वयं  अपने अतीत को भी.

          


        




             


            

          

            

           

           

           

         

        



   



Cover of the upcoming book